Friday, December 23, 2011

मेरी मुहब्ब्त. . . .

ऐ जिन्दगी मै तुझको कैसे बताऊ,
अपनी मुहब्बत उसके लिये उसको कैसे जताऊ॥

वो भी क्या दिन था,
जब एक समोसा हम दोनो के बीटविन (Between) था।
जहा मिले थे हम पहली बार,
हम दोनो के नैना हुए थे दो से चार।
जहा हर तरफ फ़्लावर्स स्केटरिन्ग (Scattering) था,
वो कोई और नही कौलेज का ही कैन्टिन था॥

मै समझ ना पाया कि ज्यादा क्या अजिब था,
उसका मेरा किस्मत कनेक्शन या उसका मुझको देख एक अजिब सा रियेक्सन।
जो भी हो पर लगता है ये सब पहले से ही फ़िक्स्ड था,
हम दोनो कितने भी अलग क्यो नही पर डेस्टिनी तो सेम था॥

और जब मिलते तो वो मुलाकात ही क्या,
जिसमे उसका साथ ना हो,
उसका मेरे हाथो मे हाथ ना हो,
कुछ खट्टी मीट्ठी बात ना हो,
और उन बातो मे ज़्ज़बात ना हो॥

छुट्टीयो मे जब घर पर होते,
मिलने के नये-नये टोटके ईजाद किया करते थे।
मिलना तो दुर बात करना भी मोहाल था,
इस लिए सब कुछ छोड घन्टो मैसेज से चैटिन्ग किया करते थे॥

दुरसन्चर प्राधिकरण को हमारी ये हरकत रास ना आयी,
उसने भी एस.एम.एस. की गिनती पर लगाम लगाई,
पर कुछ दिनो बाद उसने भी थोडी नरमी दिखाई,
काफी सोच समझ कर फ़ाइनली एस.एम.एस. की गिनती बढाई,
ये देख हममे भी एक खुशी की लहर छाई,
पुरी तो नही पर थोडी तो सुकुन जरुर आई॥

अब तो बीत गये वो दिन,
जिसमे हम ना रह सकते थे तेरे बीन।
चारो ओर अजब सी उदासी छायी है,
अब तक ये बात मैने किसी को नही बतायी है. . . . .

सब कुछ भुला मै यु ही जीता जा रहा हु,
अब अपनी तन्हाईया और गम, खुशी के शराब के सन्ग मिला पीता जा रहा हु॥

जहा उनके पलको के छाव मे गुजरते थे दिन,
अब तो राते भी है उनके एहसास के बिन॥

हर चुप्पी मे हजार सवाल छिपे होते है,
पर अब उन सवालो के जबाब देने को कोई ना होता है॥

एक तु ही मेरी प्रीत थी एक तु ही मेरी प्रीत है,
ऐ जिन्दगी मै तुझसे क्या सवाल करु तेरी तो यही रीत है॥

ऐ जिन्दगी मै तुझको कैसे बताऊ,
अपनी मुहब्बत उसके लिये उसको कैसे जताऊ॥

2 comments:

  1. WAH WAH, WAH WAH, KYA BAT HAI, KYA BAT HAI


    NICE G NICE

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  2. fadu hai bhai wt a thought yaar

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